मनुष्य की अपूर्णता
| मनुष्य की अपूर्णता |
कुत्ते ने कहा-"भगवन्! मुझे तो सब अभाव ही अभाव दिखाई देते हैं, न वस्त्र, न आहार, न घर और न इनके उत्पादन की क्षमता।" ब्रह्माजी बहुत पछताए। फिर रचना शुरू की-एक बैल बनाया।
जब अपना जीवनक्रम पूर्ण करके वह ब्रह्मलोक पहुँचा तो उन्होंने उससे भी यही प्रश्न किया। बैल दुखी होकर बोला-"भगवन्! आपने भी मुझे क्या बनाया, खाने के लिए सूखी घास, हाथ-पाँवों में कोई अंतर नहीं, सींग और लगा दिए। यह भोंडा शरीर लेकर कहाँ जाऊँ।" तब ब्रह्माजी ने एक सर्वांग सुंदर शरीरधारी मनुष्य पैदा किया। उससे भी ब्रह्माजी ने पूछा-"वत्स, तुझे अपने आप में कोई अपूर्णता तो नहीं दिखाई देती?" थोड़ा ठिठक कर नवनिर्मित मनुष्य ने अनुभव के आधार पर कहा-"भगवन्! मेरे जीवन में कोई ऐसी चीज नहीं बनाई जिसे मैं प्रगति या समृद्धि कहकर संतोष कर सकता।" ब्रह्माजी गंभीर होकर बोले-"वत्स! तुझे हृदय दिया, आत्मा दी, अपार क्षमता वाला उत्कृष्ट शरीर दिया। अब भी तू अपूर्ण है तो तुझे कोई पूर्ण नहीं कर सकता।"
अनासक्त कर्म ही सच्चा योग
अश्वघोष को वैराग्य हो गया। भोग-विलास से अरुचि और संसार से विरक्ति हो जाने के कारण उसने गृह-परित्याग कर दिया। ईश्वर-दर्शन की अभिलाषा से वह जहाँ-तहाँ भटका, पर शांति न मिली। कई दिन से अन्न के दर्शन न होने से क्षुधा और थके हुए अश्वघोष एक खलिहान के पास पहुँचे। एक किसान शांति व प्रसन्न मुद्रा में अपने काम में लगा था। उसे देखकर अश्वघोष ने पूछा"मित्र! आपकी प्रसन्नता का रहस्य क्या है?" 'ईश्वर-दर्शन' उसने संक्षिप्त उत्तर दिया। मुझे भी उस परमात्मा के दर्शन कराइए? विनीत भाव से अश्वघोष ने याचना की। अच्छा कहकर किसान ने थोड़े चावल निकाले। उन्हें पकाया, दो भाग किए, एक स्वयं अपने लिए, दूसरा अश्वघोष के लिए। दोनों ने चावल खाए, खाकर किसान अपने काम में लग गया। कई दिन का थका होने के कारण अश्वघोष सो गया। प्रचंड भूख में भोजन और कई दिन के श्रम के कारण गहरी नींद आ गई। और जब वह सोकर उठा तो उस दिन जैसी शांति, हल्का-फुल्का, उसने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। किसान जा चुका था और अब अश्वघोष का क्षणिक वैराग्य भी मिट गया था। उसने अनुभव किया कि अनासक्त कर्म ही ईश्वरदर्शन का सच्चा मार्ग है।आत्माभिमुख बनो
माहिष्मती के प्रतापी सम्राट नृपेंद्र का यश पूर्णिमा के चंद्रमा की भाँति सर्वत्र फैल रहा था। राजकोष, सेना, स्वर्ण, सौंदर्य, शक्ति किसी वस्तु का कोई अभाव न था। महाराज नृपेंद्र प्रजावत्सल और न्यायकारी थे। संपूर्ण प्रजा भी उन्हें बहुत श्रद्धा की दृष्टि से देखती थी। समय बीता। शक्तियाँ घटी। शरीर टूटा। वृद्धावस्था बढ़ने लगी और उसके साथ ही नृपति के अंतर में उद्वेग और क्षोभ छाने लगा। उन्होंने बोलना-चालना बंद कर दिया। किसी से मिलते भी नहीं थे। उदास, बेचैन राजा न जाने किस चिंता में डूबे रहते। एक दिन बड़े सवेरे सम्राट राज उद्यान की ओर निकल गए। एक स्फटिक शिला पर पूर्वाभिमुख अवस्थित नृप अब भी कोई वस्तु खोज रहे थे।धीरे-धीरे प्रातः रवि उदित हआ। राजसरोवर में उनकी बालकिरणें पड़ी और सहस्र दल कमल खिलने लगा। धीरे-धीरे कमल पूर्ण रूप से खिल गया और अपना सौरभ सर्वत्र बिखेरने लगा। आत्मा से आवाज फूटी-क्या तुम अब भी रहस्य नहीं जान पाए कि सूर्य का प्रकाश कहाँ से आता है? प्रकाश उसका अंतर स्फुरण नहीं है क्या? कमल का सौरभ उसके भीतर से ही फूटता है। यह जो सर्वत्र जीवन दिखाई देता है वह सब विश्व-आत्मा के भीतर से ही फूटता है। आनंद का स्रोत तुम्हारे भीतर है उसे तुम्हें ही जगाना पड़ेगा। उसके लिए आत्मोन्मुख बनना पड़ेगा और साधना करनी पड़ेगी।
पंचाग्नि विद्या
वाजिश्रवा ने अपने पुत्र नचिकेता के लिए यज्ञ-फल की कामना से विश्वजित यज्ञ आयोजित किया। इस यज्ञ में वाजिश्रवा ने अपना सारा धन दे डाला। दक्षिणा देने के लिए जब वाजिश्रवा ने गौएँ मँगाई तो नचिकेता ने देखा वे सब वृद्ध और दूध न देने वाली थीं, तो उसने निरहंकार भाव से कहा-"पिताजी निरर्थक दान देने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती।" इस पर वाजिश्रवा क्रुद्ध हो गए और उन्होंने अपने पुत्र नचिकेता को ही यमाचार्य को दान कर दिया। यम ने कहा-"वत्स! मैं तुम्हें सौंदर्य, यौवन, अक्षय धन और अनेक भोग प्रदान करता हूँ।" किंतु नचिकेता ने कहा-"जो सुख क्षणिक और शरीर को जीर्ण करने वाले हों उन्हें लेकर क्या करूँगा, मुझे आत्मा के दर्शन कराइए। जब तक स्वयं को न जान लूं वैभवविलास व्यर्थ है।"
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